by – अल्लाम अशरफ़

मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ,
अपना हिंदुस्ताँ कभी इंडिया न हुआ,

टोटके हर मर्ज़ के हैं बाबा के झोले में,
साइयंटिफ़िक अप्रोच से कोई वास्ता न हुआ,

प्रपंच रचता रहा पंडित तुम्हारे आँगन में,
क्या तुम्हारे घर हवन का वाक़या न हुआ?

पियो मूत्र गाय का, हरेगा दुःख सारे,
क्या हुआ जो भुखमरी की दवा न हुआ,

मज़दूर पिट रहा है सड़कों पे,
उसकी भूख कोई सरकारी मसला न हुआ,

मर गयी ‘अर्चना’ मुज़फ़्फ़रपुर की पटरी पे,
करोड़ों के वादे का कोई फ़ायदा न हुआ,

कौन देखेगा उसके बच्चों को कौन सुध लेगा,
ऐसी मौतों से जो रुसवा हो वो नेता पैदा न हुआ,

ऐसी ख़बरों पे भी कुछ नहीं बोलता रहबर मेरा,
ऐसा पत्थर-दिल कोई रहनुमा न हुआ…


अल्लाम अशरफ़

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