बिना पुनर्वास डूब से सर्वोच्च अदालत की अवमाननाबड़वानी,धार जिलों में जल सत्याग्रह |

गत वर्ष 17 सितंबर 2019 के रोज सरदार सरोवर में पानी भरकर पूर्ण जलाशय स्तर तक पहुंचाना किया था प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर|

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र कुछ गुजरात में 30,000 से अधिक परिवारों को नजर अंदाज करते हुए गांव, घर, मंदिर, मस्जिद, लाखों पेड़ो को जलसमाधि देने का यह अघोरी निर्णय ही था|

17 मई 2014 को मोदी सरकार में सत्ता में आने के बाद 17 दिनों में ही यह निर्णय लिया गया कि क़ानून, नीति तथा सर्वोच्च अदालत के फैसले जो भी हो, बांध की उंचाई और जल स्तर अंतिम तलांक तक पहुंचाया जाएगा| 2014 और 2017 के बीच 17 मीटर्स उंचे गेटस खड़े कर दिए गये लेकिन पुनर्वास पूरा करने, हर एक प्रभावित किसान, मजदूर, मछुआरा, या व्यापारी को भी आजीविका और मकान के लिए भूखंड के साथ नयी जिंदगी, देने की कानूनी शर्त पर अमल करने की ख्व्वाहिश नहीं दिखाई दी| राजनीतिक इच्छाशक्ति की, जबकि बड़ी परियोजनाओं के सामाजिक, पर्यावरणीय पहलूओं पर नहीं के बराबर होने का, विस्थापितों का दर्द न समझने का अनुभव आया, तब नर्मदा घाटी के दशकों से चले आंदोलन ने संघर्ष तेज करते हुए जल सत्याग्रह एवम 17 प्रतिनिधी महिला-पुरुषों का अनिश्चितकालीन अनशन का रास्ता अपनाया| पुलिस बल और जेल के साथ जल प्रलय का सामना करते हुए आखिर विस्थापितों को कई नये अधिकार और अनुदान के आदेश प्राप्त हुए| आज तक अगर उनका पालन होता तो संघर्ष के आगे निर्माण में ही लगे रहते हम विस्थापित|

        आज फिर जलसत्याग्रह का रास्ता क्यों अपनाना पड़ा है नर्मदा के विस्थापितों को?  क्या वे 35 सालों के संघर्ष से अपना हक नहीं पाये हैं? घाटी के लोगों ने, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तथा गुजरात में सतत जारी रखें कानूनी और मैदानी संघर्ष से ही तो किसी अन्य परियोजना की तुलना में, नर्मदा के ही अन्य बांध हो या देश दुनिया की कोई योजना, सरदार सरोवर के 20,000 विस्थापितों को वैकल्पिक खेती का और करीबन 40,000 परिवारों को भूखंड का लाभ मिला जरुर| लेकिन आज भी बचे हुए कुछ हजार परिवारों को संघर्ष के बिना पुनर्वसित होना संभव नहीं है| हजारों परिवार जिनमें अधिकांश भूमिहीन है, दलित, आदिवासी है, किसानो सहित विवध – व्यवसाय के समुदाय है, उन्हें कुछ लाभ मिले तो भी संपूर्ण पुनर्वास नहीं मिला, तो वे बेघर है या बेरोजगार| आंदोलन ने नीति बदलायी, नये प्रावधान मंजूर करवाये, ‘बिना पुनर्वास डूब नहीं’ के सर्वोच्च अदालत के फैसले – 2000, 2005 और 2017 में – हाथ आये किन्तु उन पर संपूर्ण पालन नहीं होना न्यायालय की अवमानना का ही मामला था और है| लेकिन इस प्रकार की अवमानना पर अदालतों में आसानी से न्याय हासिल नहीं होता; न हि शासनकर्ताओं को दंडित किया जाता! समाज विभाजित रह जाता है ‘विकास’ के प्रत्ति अंधश्रद्धा रखने और विस्थापितों के जीने के अधिकार के प्रति संवेदना रखने वालों में, यह भी अनुभव रहा| देशभर के समर्थकों के साथ संघर्ष और निर्माण से आंदोलन आगे बढकर हजारों ने अपना हक हासिल किया| फिर भी कोई विश्वास कर सकता है कि भू-अर्जन न किये खेती में और घरों में भी पानी घूस गया है| बिना अर्जित हजारों एकड़ भूमि में कड़ी फसल, टापू बनने से निकल पाते किसान, तो पिछले साल और इस साल भी बरबाद हुई है| डूबे रास्तों पर पूल बनाने के प्रस्ताव तो हुए किन्तु मंजूरी मिलते एक साल निकल गया – दोनों सरकारों ने किसानों की नुकसानी और हैरानी न समझी, न भरपाई दी| बेक वाटर लेव्हल्स का यह खेल सालों पहले शुरू हुआ जबकि विस्थापितों – प्रभावितों की संख्या और बचा हुआ कार्य कम से कम क्या, ‘nil’ या ‘0’ बताने का षडयंत्र रचा गया| बेक वाटर लेव्हल बदली और हजारों विस्थापितों को डूब से बाहर धकेला – मात्र कागज पर! उनके डूबने पर बने पंचनामे, नहीं मिली भरपाई| बिमा कंपनियों की लूट के बावजूद उनसे देने का वायदा कांग्रेस सरकार से हुआ किन्तु कार्यवाही आज भी प्रलंबित!   

        मध्यप्रदेश शासन में 2018 में बदलाव आने पर कांग्रेस सरकार से संवाद शुरू होकर कई निर्णय हुए, पर कई अधूरे रह गये| कई आश्वाशन पाये| अमल हुआ तो हर तहसील में सैंकड़ो परिवार पुनर्वसित हो पाये| लेकिन काफी कुछ कार्य बचा है और शासन बदल गयी तो निर्णय अधूरे रह रहे हैं| महाराष्ट्र में भी सैंकड़ो आदिवासीयों का पुनर्वास बाकी है, जिनके बारे में प्रक्रिया जारी है – जमीन खरीदने, आबंटित करने और पुनर्वास स्थलों पर सुविधा देने की|

पुनर्वास के बिना वंचित परिवारों की हकीकत नकार नहीं सकती शासन|

मध्यप्रदेश में पहाड़ी और मैदानी विस्थापितों के 6000 आवेदन तो शिकायत निवारण प्राधिकरण के समक्ष प्रलंबित है |  करीबन 9000  आवेदनों पर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का निर्णय पिछले 2 सालों तक चर्चा – विचार, भरपूर संवाद होने के बावजूद नहीं हुआ है| राजघाट, जांगरवा ,छोटा बडदा (जिला बडवानी) में सैंकड़ो की सुनवाई, कडमाल, एकलबारा (जिला- धार) बिजासन, डेहर निसरपुर में जाँच – परख आदि होकर भी प्रक्रिया अंतिम स्तर तक नहीं पहुँची| आज भी करीबन 1650 परिवार टीनशेड में 10’X12’ के कमरों में रहते हैं जिन्हें पात्रता तय करके भूखंड या अनुदान देना बाकी है| सर्वोच्च अदालत के 2017 के निर्णय में भूमी आबंटित नहीं किये परिवारों को 60 लाख रू. देने के आदेश के पालन की राह देख रहे हैं, सैंकड़ो परिवार| केवटों को चाहिए घाट और उस पर अधिकार| मछुआरों की मध्यप्रदेश में 32 और महाराष्ट्र में 10 से अधिक सहकारी समितियों को चाहिए जलाशय पर अधिकार|

        यह हकीकत 15 सितंबर 2020 के रोज, दो दिन पहले संभागीय तथा नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के आयुक्त पवनकुमार शर्मा जी और अन्य अधिकारियों से हुई ऑनलाइन चर्चा में उन्होंने मंजूर करते हुए इसी महिने के अंत तक कई प्रकरणों में निर्णय का आश्वासन दिया है जरुर! क्या वह पूरा होगा?

पिछले 20 दिन से क्रमिक अनशन पर बैठे ग्राम – पिछोड़ी और अवल्दा के अनशनकारियों ने इस आशा के साथ कि आयुक्त महोदय स्वयं के आश्वासनों पर खरे उतरेंगे आज क्रमिक अनशन समाप्त किया| धार जिले के ग्राम कड़माल, चंदनखेड़ी, और चिखल्दा (जिला – धार) में क्रमिक अनशन जारी रहेगा|

        मध्यप्रदेश शासन यह भी जानती है कि ‘पुनर्वास के बिना डूब’- गैर कानूनी और अन्यायपूर्ण होते हुए, सर्वोच्च अदालत ने 24.10.2019 के आदेश में कहा कि चारों राज्यों के (मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान) मुख्यमंत्रीयों की बैठक होकर तय हो कि पुनर्वास में क्या होना है और जलस्तर कितना रखना होगा| इस पर अमल करने के बदले केंद्र शासन ने टाल दी बैठक और बैठक की तारीख तय करने में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की कांग्रेस शासन के साथ चाल खेली| शुक्रवार के रोज सोमवार की बैठक का निमंत्रण भेजने पर कमलनाथ जी ने कुछ दिन बाद रखने का आग्रह किया तो दो दिनों में ही शासन बदलने का नाट्य शुरू होकर मामला ठप्प हुआ | महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार को तो बैठक का निमंत्रण ही नहीं पहुँचाया|

                      फिर एक बार सर्वोच्च अदालत की हुई है अवमानना|

आज जल स्तर 138.68 मीटर पर पहुंचाते वक्त गुजरात और केंद्र शासन मिलकर बांध के उपर तथा नीचे नर्मदा घाटी के क्षेत्र में डूब भुगतने वालों को नजरअंदाज कर रहे हैं | मध्यप्रदेश शासन चुप क्यों हैं? नर्मदा की पूरी घाटी में बड़े और मझौले बांधो के जलाशयों की शृंखला से जल नियोजन में न केवल त्रुटिया बल्कि केन्द्रीय जल आयोग के वर्षाऋतू के पहले जलाशय रिक्त करने के नियमों का उल्लंघन भी है|

भरूच शहर और 200 गुजरात के गांवो के लिए खतरा बताते हुए बांध के गेट्स खोलने में हिचकिचा रही है गुजरात शासन! क्या सरदार सरोवर बांध निर्माताओं के गले की हड्डी बन गई है? बांध से मूल नियोजन के अनुसार सिंचाई न पाते हुए नहरों से हैरान है कच्छ, सौराष्ट्र के किसान| 50% नहरों का तो निर्माण ही नहीं होने की बात सरदार सरोवर निगम के अध्यक्ष ने अभी अभी मंजूर की है| भूमिगत पाइपलाइन न डालते हुए करोड़ो का भुगतान और अन्य कई नर्मदा योजना संबंधी कार्यो का भ्रष्टाचार अब खुलकर सामने आया है| नीचेवास के मछुआरे, किसान और शहरवासी भी हैरान है, नर्मदा में सुखा और बाढ़ के चक्र से !

        इस स्थिति में क्या संभव है प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाना ? गुजरात में नर्मदा अब पर्यटकों की भक्ष्य बन रही हैं| आदिवासी किसानों के लाभ का लक्ष्य भूल गये हैं| आदिवासीयों को पर्यटन के लिए उजाड़ना जारी है|

           आज नर्मदा घाटी के विस्थापित पिछोडी(जिला – बड़वानी), चिखल्दा, कड़माल, चंदनखेड़ी, निसरपुर (जिला – धार), में जलसत्याग्रह पर उतरे हैं| चेतावनी है यह, अगर पुनर्वास भी पूरा नहीं हुआ तो चूप नहीं बैठेंगे हजारों विस्थापित| किसान, मजदूर, मछुआरे, केवट, दुकानदार ….. सब मिलकर तेज करेंगे आन्दोलन|

जगदीश पटेल, बच्चूराम कन्नोजे, श्यामा-भारत, रामेश्वर सोलंकी, गेंदालाल भिलाला, राधा बहन, रणछोड़ पाटीदार, तुलसीराम पाटीदार, सुरेश प्रधान, कुसुम बहन, मुकेश भगोरिया बाबु भाई चिखल्दा, मंजू बहन, रोहित ठाकुर, कमला यादव, पवन यादव, राहुल यादव

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